दुबे का बेबाक-अंदाज

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mithilesh dhar dubey


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लेकिन माँ नहीं

Posted On: 18 May, 2014  
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Hindi Sahitya Others में

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वीर जवानों को नमन

Posted On: 25 Mar, 2014  
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नारी स्नेहमयी जननी—–मिथिलेश

Posted On: 30 Dec, 2011  
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नारी स्नेहमयी जननी—–मिथिलेश

Posted On: 30 Dec, 2011  
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पर्दा प्रथा: विडंबना या कुछ और———मिथिलेश दुबे

Posted On: 22 Jul, 2011  
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नारी स्नेहमयी जननी—–मिथिलेश

Posted On: 24 Feb, 2011  
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प्रेम डे अथवा लूट डे–(एक लेट पोस्ट)—-मिथिलेश

Posted On: 16 Feb, 2011  
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जब नारी शील उघड़ने लगे——— मिथिलेश दुबे

Posted On: 9 Feb, 2011  
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कट्टरताओं मत बाँटो देश —- मिथिलेश धर दुबे

Posted On: 25 Jan, 2011  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा:

मिथिलेश जी ! अच्छे लेख के लिए बधाई ..... -------------------------------------------------------------------------------------------------------------- जहाँ तक मेरा मानना है कि, न ही तो सारे पुरुष खराब हैं, ना ही सारी महिलायें | परन्तु साथ ही साथ ये भी कहना चाहूंगा कि न ही सारे पुरुष अच्छे हैं, ना ही सारी महिलायें | तो इस दशा में जो लोग मानवता के प्रतिकूल आचरण, क्रियाकलाप करते हैं, बिना किसी लिंगगत भेदभाव के उन्हें उचित {निर्देश, दंड} दिया जाय | तो संभव है स्थिति में संतोषजनक सुधार आ जाय | किन्तु अगर किसी भी एक पक्ष कमज़ोर मानते हुए उसकी गलतियों की अनदेखी की जायेगी तो संभव है, हर स्वतन्त्रता देने के बाद भी एक पक्ष में मूल्यों का ह्रास होता चला जाएगा और, और स्थिति सोचनीय हो जायेगी | ------------------------------------------------------------------------------------------------------------ जैसा कि सभी जानते हैं कि कोई भी बिगड़े काम की उत्तरदायित्व नहीं लेना चाहता, तो इस दशा में उसके पास एक ही विकल्प होता है, दोषारोपण | हमें { पुरुषो, और महिलाओं } को अपने कामों की उत्तरदायिता लेना सीखना होगा, अन्यथा यदि हमें दोषारोपण की आदत पड़ गयी तो, सुधार कोसों दूर चला जाएगा | ------------------------------------------------------------------------------------------------------ स्वतंत्रता हर किसी का मौलिक अधिकार है, किन्तु निरा स्वच्छंदता से निकाय के अंगों में पारस्परिक सम्बद्धता की कमी आ जाती है, परिणाम स्वरुप बिखराव होने लगता है | उद्दहरानार्थ :- यदि पृथ्वी किसी तरह परिक्रमण को स्वच्छंद हो तो जीवन कि कोई संभावना नहीं होगी | स्वतंत्रता आवश्यक तो है, किन्तु सिर्फ इतनी की निर्भरता न रहे |

के द्वारा: Shailesh Kumar Pandey Shailesh Kumar Pandey

मिथिलेश जी आश्चर्य और दुःख के साथ कहना पड़ रहा है की इतने बेहतरीन लेख पर कोई प्रतिक्रिया नहीं है... जबकि यह विषय बहुत महत्वपूर्ण है ... ये बाते शायद आज के भौतिक वादी आधुनिक विचारधारा को समझ में नहीं आई ,,तो विरोध स्वरुप ही कुछ कहते... पर कोई बात नहीं.... समस्या ये है की आज की आधुनिक विचारधारा जो है वह नारी के प्रति ज्यादा संवेदनशील होने का दिखावा कर रही है .... ताकि नारी को भौतिक सुखो की तरफ आकर्षण कर के बाजारवाद के आकर्षक और लुभावनी दुनिया की तरफ आकर्षित किया जा सके.जहा उसके शरीर और भौतिक ढाचे का प्रयोग कर के आर्थिक लाभ कमाया जाये और उसमे नाम मात्र अर्थ उसकी झोली में डाल दिया जाये... . और उसे लगे की उसने आजादी प् ली है जीवन का सुख पा लिया है.. बाजार समाज ,,संस्कृति और शांति में विश्वास नहीं करता.... , बाजार ने नारी के मुक्ति सम्बन्धी आन्दोलन को अपने हिसाब से दिशा दे दी है.. और हमें लगता है की नारी ने अपनी दिशा खुद चुन ली है और वह प्रगति के मार्ग पर बढ़ रही है... जबकि हकीकत एकदम उलटी है ............इस ग्लैमर में उसे सारे सुख मिल रहे है और जो इनका विरोध करता है उसे पुरुषवादी सोच से ग्रसित कह कर ... किनारे कर दिया जा रहा है.. यह बहुत बड़े स्तर पर हो रहा हिया और इसमें बाजार की बड़ी बड़ी शक्तिया लगी है.. जिनका कब्ज़ा प्रचार के संसाधनों पर भी है ... इसलिए दूसरी कोई आवाज नहीं सुनी जा रही है.... बढ़िया पोस्ट डाली है आपने ..अभी और चर्चा होगी ...

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

मिथिलेश जी बढ़िया पोस्ट डाली है आपने ... ये ये ठीक है की सार्वजनिक रूप से महिलाओ के लिए ऐसे शब्द मजाक में भी नहीं कहे जाने चाहिए और ऐसा समझ कर राय जी ने माफ़ी मांग ली है ....मगर आपका विश्लेषण एकदम सही है की मीडिया और ये तःथाकथित नारी मुक्ति वालो के लिए संजीवनी जैसा ही है क्योकि ये बेचारे वही घिसे पिटे मुद्दे पर चिल्ला चिल्ला कर थक जाते है.... और ऐसा कोई मुद्दा मिल जाता है तो चौका मरने में देर नहीं करते .... ये नारी मुक्ति संगठन अपने विचार पश्चिम से आयात कर रहे है ..... इसलिए और ये भारतीय परिवेश का का खा गा भी नहीं समझते.. ये नारी मुक्ति का मतलब नारी देह की मुक्ति ही समझते है और समझाते है ...क्योकि बाजार में सबसे ज्यादा डिमांड नारी देह की बढ़ चुकी है ..इसलिए प्राचीन रखैल परंपरा को आज लिव इन रिलेशन के रूप में नारी की आजादी का झंडा बना कर फहराया जा रहा है ... मीडिया तो इसमें पगलाया ही रहता है की कब ऐसा मुद्दा हाथ लगे ..जससे नारी को और वस्त्रहीन कर दिया जाये.... और नारी भी पुरुषो के परिधानों के कवर पर नग्न छप कर खुश है .. ये वास्तव में भ्रमित कर रहे है... इनका सारा जोर इस्पे है की कैसे पुरुष को नारी के लिए एक रावन , एक दुशाशन, एक अभिशाप सिद्ध कर दिया जाये.... ये पूरक को प्रतिद्वंदी बनाने पर तुली हुई है ...इनका पुरजोर विरोध होना चाहिए....

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY




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